तेल का वैश्विक मूल्य एवं ओपेक का विश्व तेल उत्पादन में हिस्सा 1965-2013

तेल की (बेतुकी) धार

“सत्य पचाना अत्यंत कठिन है” – कार्ल यंग, मनोविज्ञान के जनक

चित्र-विचित्र तर्क दिए जा रहे हैं कच्चे तेल की गिरती कीमतों को लेकर| दो साल पहले किसी को सपना भी नहीं आ सकता था कि तेल की कीमतें तीन गुना से भी अधिक गिरकर ३०% के आस-पास पहुँच जाएँगी| एक साल से भी ज्यादा समय से तेल रसातल में है, छः साल के न्यूनतम स्टार पर; पंद्रह वर्ष पुराणी कीमतों पर; विश्व में आबादी और औद्योगिकीकरण, यांत्रिकीकरण लगातार बढ़ रहा है| मांग बढ़ रही है पर आपूर्ति उससे भी अधिक तेजी से बढ़ रही हैं|

पर क्यों? क्यों तेल उत्पादक आतुर हैं उत्पादन बढ़ाने पर जबकि सारे विशेषज्ञ अब एम. किंग हबर्ट से सहमत हैं| हबर्ट ने १९५६ में गणितीय प्रतिपादन किया कि कच्चे तेल का उत्पादन किसी दिन अपने उच्चतम बिंदु पर पहुँच जायेगा और फिर कच्चे तेल का उत्पादन धीरे-धीरे घटेगा| तेल की नयी खोजें होंगी पर पुराने कुँए ज्यादा तेजी से सूखेंगे| यह बिंदु २०१५ हो सकता है या २०३०; पर वह समय दूर नहीं| अर्थात् तेल बहुत कीमती है और यह सभी जानते हैं| फिर क्यों ओपेक (आर्गेनाईजेशन ऑफ़ आयल प्रोड्यूसिंग एंड एक्सपोर्टिंग कन्ट्रीज) और पश्चिमी तेल कम्पनियाँ उत्पादन बढ़ाकर खुद को नुकसान पहुंचा रहे हैं? यदि तेल की कीमतें दुगनी हो जाएँ तो उन्हें आधे उत्पादन पर उतना ही फायदा होगा|

इस घटनाक्रम को उत्पादकों की परस्पर प्रतियोगिता का नतीजा बतलाकर विशेषज्ञ जनता की आँखों में धूल झोंक रहे हैं या फिर उनकी आँखें सच्चाई नहीं देख पा रही| आंकडें, इतिहास, सत्य और तथ्य कहीं और इंगित कर रहे हैं|

तेल का वैश्विक मूल्य एवं ओपेक का विश्व तेल उत्पादन में हिस्सा 1965-2013
तेल का वैश्विक मूल्य एवं ओपेक का विश्व तेल उत्पादन में हिस्सा 1965-2013

तेल का वैश्विक मूल्य एवं ओपेक का विश्व तेल उत्पादन में हिस्सा 1965-2013

विश्व तेल उत्पादन का आधा हिस्सा ओपेक का रहा है, १९७३ में भी और अब भी| ओपेक में ९०% हिस्सा मध्य पूर्व के देशों का है और इसका एक तिहाई हिस्सा सऊदी अरब का है| विश्व तेल बाज़ार में १५-१६% हिस्सेदारी के चलते सन १९७३ में सऊदी अरब ने ‘प्रथम तेल संकट’ पैदा किया| १९७३ के सितम्बर महीने में इसराइल और उसके मुस्लिम पड़ोसियों में जंग छिड गयी थी| इस युद्ध को ‘योम किप्पूर युद्ध’ के नाम से जाना जाता है| इस युद्ध में इसराइल के पीछे खड़ा था अमेरिका और उसके दुश्मनों के मदद दे रहा था सोवियत संघ| यह शीत युद्ध का ज़माना था| सऊदी अरब के अमेरिका से बढ़े मधुर सम्बन्ध थे १९४५ से ही| १९४५ में जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्ति की ओर था तब अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट सऊदी अरब के राजा इब्न सउद के पास दौड़े चले गए| रूजवेल्ट सीधे चर्चिल और स्टालिन से मिलकर आ रहे थे| रुसी, अमरीकी और अंग्रेज फौजें जर्मनी की राजधानी बर्लिन के दरवाजे खटखटा रही थी| सऊदी अरब के बादशाह इतने महत्वपूर्ण क्यों बन गए थे? क्योंकि अमरीकी कंपनियों स्टैण्डर्ड आयल और टेक्स्को ने १९३९ में सऊदी अरब में तेल की खोज कर ली थी| और तेल का महत्व सर्वविदित था| द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान ने ‘पर्ल हार्बर’ पर हमला मात्र इसलिए किया कि तेल की कमी ने उसे मजबूर कर दिया था| जापान अपनी तेल जरूरतों का ८०% अमेरिका से और १३% हॉलैंड से आयात करता था| युद्ध छिड़ने के बाद अमेरिका ने जापान को तेल निर्यात पर पाबंदी लगा दी| हॉलैंड ने भी सहयोग किया| जापान के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था तेल पाने का|

प्रथम विश्वयुद्ध में भी जर्मनी की हार में तेल की बड़ी भूमिका थी| तेल की कमी के कारण जर्मनी को कोयले को पेट्रोल में परिवर्तित करने पर मजबूर होना पड़ा| तेल के कुँए तब अमेरिका या मध्य पूर्व में थे, इंग्लैंड के नियंत्रण में|

प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में ही नहीं पर १९७३ के योम किप्पूर युद्ध में भी तेल ने निर्णायक भूमिका निभाई| १९४५ से १९७३ तक अमेरिका निर्यातक से आयातक बन गया था और उसने यहूदी इसराइल की मदद की थी मुस्लिम मुल्कों के खिलाफ| और सऊदी अरब मुस्लिम विश्व का चौधरी बन गया था पेट्रो डॉलर के बल पर| जब मुस्लिम मुल्क युद्ध के मैदान में इसराइल को मात नहीं दे पाये तब उन्होंने अपने तरकश से तेल का तीर चलाया| सऊदी अरब ने ओपेक के माध्यम से अमेरिका, इंग्लैंड, नीदरलैंड, पुर्तगाल, रोडेशिया, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा और जापान याने अमेरिका और मित्र देशों को तेल बेचने पर पाबंदी लगा दी|

तेल की कमी ने सभी देशों को सऊदी अरब के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया| नाटो देशों ने अमेरिका से किनारा कर लिया| अमेरिका ने भी सऊदी अरब के आगे घुटने टेक दिए और इसराइल पर दबाव बनाया कि वह सारे जीते हुए प्रान्तों को छोड़ दे| तेल की कीमतें कुछ ही महीनों में चौगुनी हो गयी केवल ५% प्रतिमाह की उत्पादन कटौती के चलते| अमेरिका में मंदी आ गयी और उत्पादन ६% गिर गया| जापान में पहली बार मंदी आई|

विश्व राजनीति में तेल की भूमिका निर्णायक है| एक बार फिर तेल का तीर चलाया जा रहा है, हालांकि अब योद्धा और रणक्षेत्र बदल गया है| तेल की गिरती कीमतों का कारण ओपेक और तेल कंपनियों की प्रतिस्पर्धा नहीं अपितु विश्व राजनीती है| विश्व राजनीति ने इन दोनों की सांठगांठ बना दी है| सऊदी अरब की पकड़ विश्व तेल उत्पादन के ५०% पर है| अमेरिका और कनाडाई तेल कंपनियों का हिस्सा मिलाकर यह ६५% हो जाता है| दोनों (अमेरिका और सऊदी) मिलकर तेल की कीमतों को आसानी से नियंत्रित कर सकते हैं|

सीरिया गृहयुद्ध में यह दोनों ताकतें एक तरफ हैं| अमेरिका का उद्देश्य सीरिया की असद सरकार को गिराना है क्योंकि असद की मित्रता रूस के साथ है| सऊदी असद को अपदस्थ इसलिए करना चाहते है क्योंकि असद शिया हैं| सऊदी वहां सुन्नियों की सरकार बनाना चाहते हैं| अमेरिका और सऊदी दोनों ने ही असद सरकार को गिराने के लिए दर्जनों सुन्नी हथियारबंद गिरोह खड़े किये हैं जिनमें आय.एस. का शुमार भी होता है| किन्तु असद सरकार का समर्थन सोवियत संघ ही नहीं ईरान भी कर रहा है, क्योंकि ईरान भी शिया है और सऊदी अरब का पारंपरिक प्रतिद्वंदी है| सुन्नी जिहादी, सीरिया में काफी बड़ा भूभाग कब्जाने में सफल हो गए हैं पर अब और आगे नहीं बढ़ पा रहे है| राजधानी दमिश्क में असद मजबूती से जमे हैं| सीरिया के संघर्ष में गतिरोध की स्थिति है|

कुछ वर्षों पहले यह स्थिति नहीं थी| तब इराक में अमेरिकी समर्थन चुनी हुई सरकार को था जो कि शिया है, चूँकि इराक में शिया बहुलता है| सऊदी अरब सुन्नी विद्रोहियों (जिसमें आय.एस.आय.एस. शामिल है) को इराक में राज करते देखना चाहता है|सीरिया में इराक के विद्रोही एक हैं: अमेरिका और सऊदी अरब| सीरिया में गतिरोध तोड़ने हेतु सैनिक उपाय अपर्याप्त रहेंगे यह अमेरिकी रणनीतिकारों को महसूस हो रहा है| चूँकि दुश्मन पर सीधा वार कारगर नहीं साबित हो रहा, उसकी रसद काटने का इंतजाम किया जा रहा है| हथियार, प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध और योम किप्पूर युद्ध की भांति तेल ही है|

किन्तु यहाँ दोनों ही योद्धा तेल उत्पादक और निर्यातक हैं| अतः प्रतिद्वंदी का आर्थिक आधार हिलाने के लिए तेल की कीमतें कम कर दी जाएँ| तेल की कीमतें गिराने हेतु तेल बाज़ार में बाढ़ ला दी जाए| रूस की विदेशी मुद्रा का ७०% और ईरान का ८०% तेल निर्यात से प्राप्त होता है| तेल की कीमतें गिरने से इनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है और आर्थिक दिवालिया राष्ट्र युद्ध नहीं लड़ते| इसी उद्देश्य से अमेरिका और सऊदी अरब तेल उत्पादन बढ़ा रहे हैं, हालाँकि इससे उन्हें भी नुकसान हो रहा है| कौन तेल की गिरती कीमतों को लम्बे समय तक सह सकता है यही सवाल है| देखते हैं तेल की इस कुश्ती में कौन पहले ची बोलता है!

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